Article summary
Abstract
उन्नीसवें सदी के उत्तरार्ध और बीसवें सदी के आरम्भ में औपनिवेशिक बिहार गंभीर सामाजिक जड़ता,
ढ़वादिता और कुरीतियों सेग्रस्त था। जातिगत भेदभाव, अस्पश्यता, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा तथा विधवाओं की
दयनीय स्थिति ने समाज के विकास को अवरूद्ध कर रखा था। ऐसी परिस्थिति में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा
संस्थापित आर्य समाज ने बिहार में सामाजिक पुनर्जागरण की नींव रखी। प्रस्तुत शोध-आलेख आधुनिक बिहार
में सामाजिक चेतना के प्रसार और कुरीति-उन्मूलन में आर्य समाज के सुधारवादी प्रयासों का ऐतिहासिक
मूल्यांकन करता है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि पटना, दानापुर, मुंगेर, आरा, भागलपुर और मुजफ्रफरपुर जैसे
केंद्रों से संचालित आर्य समाज की शाखाओं ने वैदिक आदर्शों की पुनरस्थापना के साथ-साथ व्यावहारिक
सामाजिक सुधार किए। संस्था ने जन्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था के स्थान पर गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित
सामाजिक समता का सिद्धांत स्थापित किया। अछूतोद्धार और दलित जातियों के सामाजिक अधिकारों के लिए
संगठित प्रयास किए गए। स्त्री-शिक्षा को गति देने के लिए कन्या पाठशालाओं की स्थापना हुई। विधवा पुनर्विवाह
का समर्थन कर विधवाश्रमों का निर्माण किया गया। मत्यु-भोज और दहेज जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाने के
लिए व्यापक प्रचार अभियान चलाए गए। प्रस्तुत शोध यह निष्कर्ष निकालता है कि आर्य समाज के इन प्रयासों
ने बिहार के पारंपरिक सामाजिक ढांचे में वैज्ञानिक दृष्टि, आत्मसम्मान और आधुनिक चेतना का संचार किया,
जिसने कालान्तर में स्वतंत्रता आंदोलन की सामाजिक जमीन भी तैयार की।
