Article summary
Abstract
प्राचीन भारत की परंपराओं में पिंडदान एक महत्वपूर्ण धर्म कीर्ति बिहार में भी रहा है, जो पूर्वजों की आत्मा
की शांति और मोक्ष के लिए किया जाता था आमतौर पर यह कार्य (कर्ता) पुरुष द्वारा किया जाता था, बिहार
की महिलाएं भी इस परंपरा में विशेष कर भूमि का निभाई है, जैसे की सीता माता मिथिलेश्वरी मिथिला की निवासी
थी, जो वर्तमान में बिहार राज्य के दरभंगा और मधुबनी जिले के क्षेत्र में स्थित हैं।, कुछ ऐसी लोक परंपराएं और
क्षेत्र कथाएं प्रचलित है, जिनमें कहा जाता है, कि सीता माता ने राजा दशरथ अर्थात अपने ससुर के निमित श्राद्ध
कर्म किया था, जब वह वनवास में थी, तब श्री राम वनवास के दौरान अपने पिता दशरथ जी के मरणोपरांत के
बाद श्राद्ध कर्म, तर्पण पिंडदान करना चाहे व उन्होंने नदी के किनारे श्राद्ध कर्म की व्यवस्था की थी, लेकिन जल
में जब पिंड प्रवाहित करने पर जल द्वारा स्वीकार नहीं हुआ, तब माता सीता ने जल को अपने आंचल से छुआ
और क्रिया और पाठ कर उन्होंने पिंडदान किया, तब जल द्वारा स्वीकारा गया। यह मुख्य रूप से आस्था, श्रद्धा
और नारी की धार्मिक शक्तियों को दर्शाती है, प्राचीन काल से ही जब महिलाएं विधवा हो जाती थी तब पिंडदान
की प्रक्रिया को संपन्न करती थी, बिहार की कुछ जातिय और ग्रामीण परंपराओं में भी यह देखने को मिला है
व उन्हें अधिकार प्राप्त था, कि अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए तर्पण पिंडदान करें यह धार्मिक
सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। इससे महिलाओं की धार्मिक व आध्यात्मिक भूमिका और पारिवारिक
जिम्मेदारियां को मान्यता मिली। इस प्रकार बिहार की महिलाओं ने न केवल पारंपरिक मर्यादाओं को निभाया और
साथ ही साथ पिंडदान जैसे धार्मिक कृत्यों में सक्रिय भाग लेकर समाज में अपनी पहचान बनाई है।
