प्रस्तुत शोध लेख स्वातंत्र्योत्तर भारत में दलित स्त्री चेतना और संघर्ष स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय समाज में दलित महिलाओं के विशिष्ट सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक विमर्श का एक गहन अध्ययन है। यह लेख इस तर्क को मजबूत आधार प्रदान करता है कि दलित स्त्री की समस्याएँ मुख्यधारा के नारीवाद से भिन्न हैं, क्योंकि वे जाति और लिंग के श्दोहरे अभिशापश् से निर्मित होती हैं। इस अध्ययन के माध्यम से यह विश्लेषण किया गया है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के वैचारिक आंदोलनों ने किस प्रकार दलित महिलाओं में आत्म-सम्मान और विधिक चेतना का बीजारोपण किया। इस लेख में दलित लेखिकाओं की आत्मकथाओं और साहित्य को प्रतिरोध के स्वर के रूप में रेखांकित किया गया है, जिसने सदियों के मौन को तोड़कर एक स्वतंत्र अस्मिता की पहचान स्थापित की। साथ ही, यह शोध लेख नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित विमेन जैसे संगठनों के उदय और पंचायती राज में दलित महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी परीक्षण करता है। अंततः, यह लेख इंटरसेक्शनलिटी (जाति और लिंग के संमिलन) के सिद्धांत को भविष्य की राह के रूप में प्रस्तावित करता है और यह निष्कर्ष देता है कि एक समतामूलक समाज के निर्माण के लिए दलित स्त्री की मुक्ति और उनकी चेतना का मुख्यधारा में आना अनिवार्य है।.
प्रमुख शब्द: दलित नारीवाद, दोहरा शोषण, अंबेडकरवादी चेतना, दलित स्त्री साहित्य अस्मिता की खोज, सामाजिक आंदोलन, इंटरसेक्शनलिटी,जातिगत हिंसा, मानवीय गरिमा।