रामचरितमानस और संवाद संस्कृति का परिवेश
डॉ. पी.एम. भुमरे, विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, एस.एम.बी.पी.के. महाविद्यालय, शंकरनगर, बिलोली, नांदेड़.
DOI: 10.64127/rnimj.2026v2i126003
DOI URL: https://doi.org/10.64127/rnimj.2026v2i126003
Published Date: 10 February 2026
Issue: Vol. 2 ★ Issue 1 ★ January-March 2026
Published Paper PDF:
Click here

आरंभिक अनुच्छेद-:

रामचरितमानस का जब हम संधि-विच्छेद करते हैं तब हमें तीन शब्दों की प्राप्ति होती है। यथा राम+चरित+मानस। रामचरित मानस का शब्दार्थ इस प्रकार है- राम के चरित्र (कृतित्व) का घर। राम का चरित ऐसा था जिसका अनुकरण अति प्राचीन काल से लेकर आज तक मनुष्य करता चला आ रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि राम के चरित्र में कोई विशेष विशेषता है जो सम्पूर्ण मानव समुदाय के लिए हितकारी है। इसीलिए प्रत्येक श्रद्धावान मनुष्य राम के पद चिह्नों पर चलने का अनुकरण करना चाहता है। मनुष्य के अन्तःकरण में एक अवचेतना शक्ति सदैव कार्य करती रहती है। यह अवचेतन शक्ति भक्तिमूलक आस्था है। आस्था श्रद्धा समुदाय के द्वारा अत्यधिक रूप से व्यक्ति विशेष के जीवन में अल्प अथवा अत्यधिक मात्रा में दृष्टिगोचर होती है।