प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में महात्मा गांधी के धार्मिक-राजनीतिक दर्शन और सांप्रदायिक एकता के प्रश्न का एक आलोचनात्मक एवं ऐतिहासिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। गांधीवादी राष्ट्रवाद की मूल धुरी यह अकाट्य विश्वास था कि हिंदू-मुस्लिम एकता स्वराज्य प्राप्ति के लिए एक अनिवार्य और प्राथमिक शर्त है। इस शोध में गांधी जी के सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत, पश्चिमी मॉडल से इतर उनकी सकारात्मक धार्मिक एकता की अवधारणा तथा हृदय-परिवर्तन की तकनीक का गहराई से विश्लेषण किया गया है। 1919-1922 के खिलाफत आंदोलन को मुख्य आधार बनाते हुए यह पत्र रेखांकित करता है कि कैसे यह दौर हिंदू-मुस्लिम एकता का चरमोत्कर्ष होने के साथ-साथ अनजाने में राजनीति के भीतर धार्मिक पहचान के अति-राजनीतिकरण का प्रारंभिक बिंदु भी साबित हुआ। यह शोध पत्र 1920 और 1930 के दशकों में उभरते सांप्रदायिक दंगों, गांधी जी के दिल्ली उपवास (1924) तथा गोलमेज सम्मेलन व सांप्रदायिक पंचाट (1932) जैसी औपनिवेशिक चुनौतियों के सामने गांधीवादी कूटनीति की सीमाओं की पड़ताल करता है। इसके अतिरिक्त, इसमें 1940 के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, जिन्ना-गांधी वार्ता (1944) की विफलता और कांग्रेस के भीतर बढ़ते पुनरुत्थानवादी दबावों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया गया है। अंततः, यह शोध रेखांकित करता है कि यद्यपि गांधी जी विभाजन की त्रासदी को रोकने में सांगठनिक और प्रशासनिक रूप से असफल रहे, परंतु नोआखली (1946-47) में उनका एकाकी शांति मार्च (वन-मैन बाउंड्री फोर्स) उनके नैतिक और मानवीय संघर्ष की सर्वाेच्चता को प्रमाणित करता है।.
मुख्य शब्द: महात्मा गांधी, सांप्रदायिक एकता, सर्वधर्म समभाव, खिलाफत आंदोलन, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, नोआखली का संघर्ष, अल्पसंख्यक समावेश।.