हिंदी साहित्य में नारी विमर्शः एक सैद्धांतिक अध्ययन
डॉ. शालिनी, अस्सिटेंट प्रोफेसर, हिन्दी, मान्यवर कांषीराम राजकीय महाविद्यालय, निनौआ, फर्रुखाबाद.
DOI: 10.64127/rnimj.2025v1i2005
DOI URL: https://doi.org/10.64127/rnimj.2025v1i2005
Published Date: 20 December 2025
Issue: Vol. 1 ★ Issue 1 ★ October - December 2025
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सारांश-:

हिंदी साहित्य में नारी विमर्श एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक और आलोचनात्मक क्षेत्र है, जो न केवल साहित्यिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण करता है, बल्कि समाज में स्त्री की स्थिति, उसकी चेतना, पहचान और संघर्ष को भी व्यापक संदर्भों में समझने का प्रयास करता है। प्रस्तुत अध्ययन हिंदी साहित्य में नारी विमर्श के वैचारिक आधारों, स्त्रीवादी सिद्धांतों तथा पितृसत्तात्मक संरचनाओं के प्रभाव का सैद्धांतिक विश्लेषण करता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार पारंपरिक साहित्य में नारी को आदर्श, त्यागमयी और सीमित भूमिकाओं में प्रस्तुत किया गया, जबकि आधुनिक और समकालीन साहित्य में नारी एक स्वतंत्र, जागरूक और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में उभरती है। कविता, उपन्यास, कथा और नाटक जैसी विभिन्न साहित्यिक विधाओं में नारी स्वर की अभिव्यक्ति को सामाजिक आलोचना और परिवर्तन के उपकरण के रूप में देखा गया है। साथ ही, क्षेत्रीय भाषाओं और उपसंस्कृतियों के प्रभाव से नारी विमर्श के बहुआयामी स्वरूप को भी रेखांकित किया गया है। यह अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि हिंदी साहित्य में नारी विमर्श केवल साहित्यिक परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पुनर्संरचना की प्रक्रिया का भी द्योतक है, जो स्त्री की अस्मिता और सशक्तिकरण को नए अर्थ प्रदान करता है।

मुख्य शब्द: नारी विमर्श, स्त्रीवादी सिद्धांत, पितृसत्ता, हिंदी साहित्य, स्त्री अस्मिता, सामाजिक चेतना ।